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Reflections

ठहराव कहाँ है?

लोग बदलते हैं पागल मौसम की तरह । लेकिन तू? तू भी बदल गया? सूझ-बूझ समझ, सब बेसब्री में डूब गये। अँधा तू है या मैं हो गयी हूँ? मालूम नहीं । प्यार दफना दिया आवाज़ दफना दी; तूने ये किस आक्रोश में ये कैसा बदला लिया? … दूरी बढ़ना ज़रूरी था । हम इतने करीब … Continue reading »

अपनी ओर
Fiction / Reflections

अपनी ओर

अपनी ओर खींचा क्यों जब दूर फेंख नज़रें फेर लेनी थी? तेरी याद कर कितना रोई| मेरी चीखें कभी सुनाई दी हैं?   तेरा नाम लिया करती थी| दौड़ती थी , फिर थक के चलती थी |   जो रास्ता तेरा वादा करता उसी पे नाक की सीध में चल देती| पर न तू था न तेरे आने की खबर। अच्छा प्यार किया है तुमने, अब तुमको कैसे भूलेंगे ? तेरी याद में तारे गिन कोने कोने को टटोलेंगे |    जिंदा आज भी हूँ ; तेरे बिना अभी भी जान बाकी है| पर आज भी … Continue reading »

Reflections

Dog in a Ditch

I saw a dog guiltily soaking in the cool relief of a ditch flooded with weeds swimming through loose muddy water. I had been scouting for a place to lunch at, marching to and from and peeping into all gullies and streets in the afternoon sun when this half grown stray mutt caught my eye. I do not know whether it … Continue reading »