अपनी ओर

अपनी ओर खींचा क्यों जब दूर फेंख नज़रें फेर लेनी थी?
तेरी याद कर कितना रोई| मेरी चीखें कभी सुनाई दी हैं?
 
तेरा नाम लिया करती थी| दौड़ती थी , फिर थक के चलती थी |
 
जो रास्ता तेरा वादा करता उसी पे नाक की सीध में चल देती| पर न तू था न तेरे आने की खबर।
अच्छा प्यार किया है तुमने, अब तुमको कैसे भूलेंगे ?
तेरी याद में तारे गिन कोने कोने को टटोलेंगे |
  
जिंदा आज भी हूँ ; तेरे बिना अभी भी जान बाकी है|
पर आज भी देखा करती हूँ हर शाम उसी खिड़की से बहार. तुम तो 
मुँह उठा के चल दिए, और हम तुम्हारे भगत बन फिरते रह गए|

वो याद है तुमको

“It is amazing how you unravel one layer at a time… You keep the identity of the first person a question, and then all these emotions addressed to a girl… I thought it was a love of hers who missed her after she left him, having spent years together.
I wasn’t disappointed. (There are authors/poet/<insert artist> whose post climax stage can be a let down, too many of them.)
I’m scheduling this my on blog :)”
39be0f88e289f89a97263ec366446083Shikhar Goel wears hipster glasses and writes lots of poems that I like. Translation in English may not appeal to you as much, but it is worth a try!
वो याद है तुमको?
जब मोम के रंगों से तुम
मेरी दीवारों से बात करा करती थी
बताया करती थी उनको कि क्या सिखाया है स्कूल में तुमको
सारे जज़्बात ख़ुशी और ग़म के,
सब उन्ही को बयां करती थी
उन चूने की दीवारों को तुमने
कितना खुशरंग बना डाला था
चुपचाप रहने वाली को तुमने
खुलके हॅसा डाला था
वो याद तो होगा अभी भी
कैसे मेरे दरवाज़े, तुम्हारा सारा गुस्सा सहते थे
तुम तेज़ से झटक देती थी उनको
वो कुछ भी नहीं कहते थे
भूली तो नहीं हो ना उन खिड़कियों को
जो सामने वाले समुंदर के कोने में बैठे
क्षितिज को देखा करती थी
वो जानती थी शायद,
कि वो तो नहीं, पर शायद तुम तो जाओगी कभी
उस क्षितिज के पार, और एक नया घर बसाओगी
एक राजकुमार आया था, तारों की छाँओं में
तुम्हे उड़ा ले गया था, क्षितिज के पार
मैं, तुम्हारा, पीहर का घर
बहुत याद करता हूँ तुमको
मेरे दरवाज़े अब बहुत आवाज़े करते है
चिड़चिड़े से हो गए है
शायद ख़ुद से ही बातें करते है
मेरी दीवारों का चूना झड़ता है जब
तो लगता है मोती आंसू का खोया है
बूढी हो गयी है दीवारें अब
कि उनसे अब कोई बात नहीं करता है
खिड़कियाँ बड़ी बेचैनी में रहती है
कम रौशनी में भी
बुझती सी आँखों से
क्षितिज को तकती रहती है
कि शायद दिख जाये तू
टहलती उस क्षितिज के पास
वो देख ले तुझे जी भर के
बंद होने से पहले फ़िर एक बार…
-शिखर