अपनी ओर

अपनी ओर खींचा क्यों जब दूर फेंख नज़रें फेर लेनी थी?
तेरी याद कर कितना रोई| मेरी चीखें कभी सुनाई दी हैं?
 
तेरा नाम लिया करती थी| दौड़ती थी , फिर थक के चलती थी |
 
जो रास्ता तेरा वादा करता उसी पे नाक की सीध में चल देती| पर न तू था न तेरे आने की खबर।
अच्छा प्यार किया है तुमने, अब तुमको कैसे भूलेंगे ?
तेरी याद में तारे गिन कोने कोने को टटोलेंगे |
  
जिंदा आज भी हूँ ; तेरे बिना अभी भी जान बाकी है|
पर आज भी देखा करती हूँ हर शाम उसी खिड़की से बहार. तुम तो 
मुँह उठा के चल दिए, और हम तुम्हारे भगत बन फिरते रह गए|
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